धडकता है दिल अब भी,
पर इसमें अब वों बात
नहीं |

क्यों तुम्हारा मिलना अब,
खुशियों की सौगात नहीं |

क्यों मन भारी होता है,
अब तुम्हें सोच कर भी |

क्यों हमें अब कोई आस नहीं,
हमारी हसी में वों उल्लास नहीं|

क्यों बदल गए तुम इतना ,
तुम पे होता विस्वास नहीं |

क्यों दिल में सवाल उठते है,
मिलते अब इनके जवाब
नहीं |

क्यों इतने दूर तुम लगने लगे,
की तुम्हारे होने का भी एहसास
नहीं |

क्यों अब भी
खड़े हम उसी मोड़ पे,
जिसपे थामा तुमने मेरे हाथ
नहीं |

बाहें
फैली हैं अब भी आलिंगन के लिए,
जाओ होती सदा के लिए रात नहीं |

dhadktha hai dil ab bhi,
per isme ab vo baat nahi|

kyo tumhara milna ab,
khushiyo ki saugaat nahi|

kyo man bhari hota hai,
ab tumhe soch kar bhi |

kyo hame ab koi aas nahi,
hamari hasi me vo ullas
nahi|

kyo badal gaye tum itna ,
tum pe hota viswas
nahi|

kyo dil me sawaal uthte hai,
milte ab inke jawab nahi|

kyo itne dur tum lagne lage,
ki tumhare hone ka bhi ehsaas nahi
|

kyo ab bhi
khade hum usi mod pe,
jispe thama tumne mere haath nahi|

baahe
faili hain ab bhi aalingan ke liye,
aa jaoo hoti sada ke liye raat nahi

http://kavyalok.com
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4 comments:

    Udan Tashtari said...

    बहुत उम्दा!

  1. ... on July 19, 2010 at 7:13 PM  
  2. संजय भास्कर said...

    क्यों दिल में सवाल उठते है,
    मिलते अब इनके जवाब नहीं |

    क्यों इतने दूर तुम लगने लगे,
    की तुम्हारे होने का भी एहसास नहीं |

    वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

  3. ... on July 20, 2010 at 2:24 AM  
  4. संजय भास्कर said...

    ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
    कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

  5. ... on July 20, 2010 at 2:24 AM  
  6. मनोज कुमार said...

    कविता काफी अर्थपूर्ण है!

  7. ... on July 28, 2010 at 12:04 PM